पनघट मुरलिया बाजे सखी
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | पनघट मुरलिया बाजे सखी | Panaghat muraliya baaje sakhi | सखी, पनघट पर मुरली बज रही है। |
| स्थायी | सिमिट जुवति जन ठाड़े निचेतन | Simit juvati jan thaare nichetan | युवतियाँ सिमटकर खड़ी हैं, अपनी सुध-बुध खो बैठी हैं। |
| स्थायी | पुलकित सब तन मुकुलित नयन | Pulakit sab tan mukulit nayan | उनके सारे शरीर पुलकित हैं और नयन धीरे से मुँद रहे हैं। |
| अंतरा | राग खमाज सुनाय सुलच्छन | Raag Khamaj sunaay sulachchhan | मुरली से सुंदर राग खमाज सुनाई दे रहा है। |
| अंतरा | पुलकित सब तन मुकुलित नयन | Pulakit sab tan mukulit nayan | उनके सारे शरीर पुलकित हैं और नयन धीरे से मुँद रहे हैं। |
शब्दार्थ
पनघट पानी भरने का स्थान है और मुरलिया बाँसुरी का स्नेहभरा रूप है। सिमिट में पास-पास एकत्र होने का भाव है, जबकि निचेतन संगीत में सुध-बुध खोने को कहता है। पुलकित शरीर के रोमांच को और मुकुलित कलियों की तरह मुँदते नयनों को व्यक्त करता है।