सब सखियां मिल खमाज गावो
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| राग | खमाज |
| विधा | लक्षण गीत |
| ताल | आड़ा चौताल · 14 मात्राएँ |
| लय | विलंबित |
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | सब सखियां मिल खमाज गावो | Sab sakhiyaan mil Khamaj gaavo | सब सखियाँ मिलकर खमाज गाओ। |
| स्थायी | हरि कां सुजि सुर मेलब नावों | Hari kaan suji sur melab naavon | हरि और सुर: ‘कां सुजि’, ‘मेलब नावों’। |
| अंतरा | आरोहन में रेखब तज | Aarohan men rekhab taj | आरोह में रेखब को छोड़ दो। |
| अंतरा | वादि गंधार मधुर दिखलावो | Vaadi gandhaar madhur dikhlaavo | वादी स्वर गंधार की मधुरता दिखलाओ। |
शब्दार्थ
आरोहन राग के ऊपर चढ़ते स्वरक्रम को कहते हैं। रेखब रे का और गंधार ग का नाम है। वादि प्रधान स्वर को कहता है; यहाँ गंधार की मधुरता दिखाने को कहा गया है।