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श्याम सुंदर बनमाली के सखी

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग खमाज
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय विलंबित

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी श्याम सुंदर बनमाली के सखी Shyam Sundar Banmali ke sakhi सखी, श्याम सुंदर बनमाली के लिए,
स्थायी दरस बिना जिया तरसाय Daras bina jiya tarasaay दर्शन के बिना हृदय तरसता है।
अंतरा सोहनि सूरत मोहनि मूरत Sohani surat mohani murat सुंदर सूरत, मन मोहने वाली मूरत।
अंतरा हररंग की छबि मो मन वसी सखि Harrang ki chhabi mo man vasi sakhi हररंग की छवि मेरे मन में बसी है, सखि।
अंतरा दरस बिना जिया तरसाय Daras bina jiya tarasaay दर्शन के बिना हृदय तरसता है।

शब्दार्थ

दरस प्रिय की झलक या दर्शन है, जिसके अभाव में हृदय तरसता है। सोहनि सुंदरता को और मोहनि मन मोह लेने की शक्ति को व्यक्त करता है। बनमाली वन के फूलों की माला से जुड़ा कृष्ण का नाम है।

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