अहीर भैरव
प्रातःकाल का राग, जिसमें कोमल रे और नि, शुद्ध ध तथा म पर ठहराव प्रमुख हैं।
स्वर-संकेत कैसे पढ़ें
सा आधार स्वर है। S R G M P D N शुद्ध स्वर हैं; r g d n क्रमशः कोमल रे, ग, ध और नि हैं। M^ तीव्र म है। स्वर के बाद ↑ का अर्थ तार सप्तक और ↓ का अर्थ मंद्र सप्तक है। बिना तीर वाला स्वर मध्य सप्तक का है।
परिचय
अहीर भैरव में कोमल रे की गंभीरता के साथ शुद्ध ध और कोमल नि का कोमल रंग मिलता है। आरोह और अवरोह दोनों में सातों स्वर हैं, पर राग की पहचान केवल स्वर-क्रम से नहीं बनती। G M r S का मोड़ और मंद्र नि से उठती चाल उसके स्वर-वाक्यों को पहचान देते हैं। म पर ठहराव मिलता है। इसका शांत, अंतर्मुखी भाव सुबह के समय अनुकूल लगता है।
स्वर और पहचान
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| थाट | भैरव |
| जाति | संपूर्ण–संपूर्ण (आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर) |
| प्रयुक्त स्वर | S r G M P D n; रे और नि कोमल, शेष स्वर शुद्ध हैं। |
| वादी | म (M) |
| संवादी | सा (S) |
| आरोह | S r G M P D n S↑ |
| अवरोह | S↑ n D P M G r S |
| समय | प्रातःकाल, दिन का पहला प्रहर |
| रस / भाव | शांत, ध्यानपूर्ण, भक्तिपूर्ण |
राग का व्याकरण और पहचान
पूर्वांग में G M r S की चाल स्पष्ट रखें। सा पर लौटने से पहले कोमल रे को हल्का आंदोलन दें। उत्तरांग में ध शुद्ध और नि कोमल रखें। D n D P का स्वर-वाक्य भैरव का कोमल ध लाए बिना म की ओर लौटता है। म पर ठहरने से दोनों अंग जुड़ते हैं और स्वर-वाक्य को साँस लेने की जगह मिलती है।
पकड़ और चलन के उदाहरण
G M r SD n D P, M G M r Sn↓ r S
मंद्र नि से रे और सा की छोटी-सी वापसी पूरी सरगम गाए बिना भी राग की पहचान सुनने में मदद करती है।
स्वर-वाक्यों के उदाहरण
- शुरुआत:
S r G M, G M r S। - ऊपर की चाल:
M P D n S↑, S↑ n D P। - समापन:
P M G M r S। - ध शुद्ध और नि कोमल रखें। इनके स्थान पर d और N लगाने से स्वर-सामग्री भैरव की ओर मुड़ जाती है।
मिलते-जुलते राग और अंतर
- भैरव में कोमल ध और शुद्ध नि लगते हैं। अहीर भैरव में कोमल रे तो रहता है, लेकिन ध शुद्ध और नि कोमल हो जाते हैं।
- काफ़ी के उत्तरांग में भी P D n हैं। उसमें रे शुद्ध और ग कोमल हैं; अहीर भैरव में रे कोमल और ग शुद्ध हैं।
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